हरिद्वार। पितृ पक्ष के दौरान अपने और अपने प्रियजनों के लिए पितरों की पूजा-अर्चना करने हरिद्वार पहुंचे आचार्य राहुल रावत ने श्राद्ध कर्म के वास्तविक अर्थ को समझाया है। उन्होंने शास्त्रों के उद्धरण देते हुए कहा कि श्राद्ध एक पवित्र कर्म है जो श्रद्धा का विषय है, न कि दिखावे या आडंबर का। यह हमें अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर देता है, जिससे पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है।
आचार्य रावत ने कहा कि मृत्यु के बाद 10 दिनों तक होने वाले दैनिक श्राद्ध को “नव श्राद्ध” कहते हैं, जबकि 11वें और 12वें दिन के श्राद्ध क्रमशः “नव मिश्र श्राद्ध” और “सपिंडी श्राद्ध” कहलाते हैं। इन कर्मों के बाद ही आत्मा प्रेत योनि से मुक्त होकर देव योनि में जाती है। उन्होंने बताया कि मृत्यु के एक साल बाद उसी तिथि को पार्वण श्राद्ध और हर साल पितृ पक्ष में किया जाने वाला कर्म कनागत कहलाता है।
शास्त्रों में मृत्युभोज का उल्लेख नहीं
आचार्य राहुल रावत ने शास्त्रों के अनुसार एक महत्वपूर्ण तथ्य को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि श्रुति और स्मृति जैसे किसी भी शास्त्र में मृत्युभोज जैसे शब्द का उल्लेख नहीं है। बल्कि, शास्त्रों में विषम संख्या में योग्य ब्राह्मणों को भोजन कराने का संकेत मिलता है, वह भी श्रद्धा और अभिरुचि के अनुसार।
उन्होंने मनुस्मृति के वचन का हवाला देते हुए कहा कि एक भी योग्य, वेदज्ञ ब्राह्मण को भोजन कराने से विशेष फल प्राप्त होता है, जो हजारों अयोग्य ब्राह्मणों को खिलाने से भी नहीं मिलता। महाभारत में भीष्म पितामह ने भी इसी बात पर जोर दिया था कि लाखों अपात्रों को भोजन कराने से बेहतर है कि एक ही सत्पात्र को भोजन कराया जाए।
श्रद्धा का महत्व और आर्थिक बोझ नहीं
आचार्य रावत ने भगवद्गीता के श्लोक का जिक्र करते हुए कहा कि बिना श्रद्धा के किया गया कोई भी कर्म निष्फल होता है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि श्राद्ध एक आर्थिक बोझ नहीं है। कूर्मपुराण के अनुसार, जो व्यक्ति धन से समर्थ नहीं है, वह फल, मूल या शाक से भी श्राद्ध कर सकता है। अगर वह भी संभव न हो, तो विष्णुपुराण के श्लोक के अनुसार व्यक्ति खुले में जाकर दोनों हाथ ऊपर करके पितरों से कह सकता है कि “हे पितृगण! मेरे पास आपके लिए न तो धन है, न धान्य। मेरे पास केवल आपके लिए श्रद्धा और भक्ति है।” ऐसा करने मात्र से भी पितर तृप्त हो जाते हैं।
आचार्य रावत ने कहा कि रामायण और महाभारत में भी श्राद्ध कर्म का वर्णन है। वनवास के दौरान भगवान राम ने अपने पिता दशरथ के लिए उपलब्ध सामग्री से ही पिंडदान किया था। यह बताता है कि श्राद्ध प्रदर्शन का नहीं, बल्कि श्रद्धा का विषय है।


































































































