आगरा में शुल्क नियामक समिति के गठन पर बवाल, “दोषी स्कूल” और स्कूलों के CA को सदस्य बनाने पर अभिभावकों में भारी रोष

तिथि: 22 जुलाई 2025 स्थान: आगरा

  • सालों के इंतजार के बाद बनी जिला शुल्क नियामक समिति (DFRC) की संरचना पर उठे गंभीर सवाल।
  • अभिभावक संगठन ‘पापा’ (PAPA) ने समिति में किसी भी अभिभावक प्रतिनिधि को शामिल न करने पर जताई तीव्र आपत्ति।
  • कई गंभीर आरोपों से घिरे डीपीएस स्कूल और निजी स्कूलों के चार्टर्ड अकाउंटेंट को सदस्य बनाने से समिति की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न।
  • अभिभावक संगठन ने 23 जुलाई को होने वाली बैठक को रद्द कर समिति के तत्काल पुनर्गठन की मांग की, अन्यथा धरने की चेतावनी दी।

आगरा। उत्तर प्रदेश सरकार के 2018 के शासनादेश के लगभग सात साल बाद, आगरा में अभिभावकों के लंबे संघर्ष के बाद आखिरकार जिला शुल्क नियामक समिति (DFRC) का गठन तो हो गया, लेकिन इसका स्वरूप सामने आते ही यह विवादों के केंद्र में आ गई है। अभिभावकों के हितों की रक्षा के लिए बनी इस समिति में ही अभिभावकों को जगह नहीं दी गई है। उल्टे, समिति में एक ऐसे स्कूल के प्रतिनिधि और एक ऐसे चार्टर्ड अकाउंटेंट को सदस्य बना दिया गया है, जिन पर सीधे तौर पर निजी स्कूलों के साथ मिलकर काम करने और अभिभावकों के हितों की अनदेखी करने के गंभीर आरोप हैं।

दीपक सिंह सरीन

प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ पेरेंट्स अवेयरनेस (PAPA) संस्था के राष्ट्रीय संयोजक, दीपक सिंह सरीन ने इस “गुपचुप” और “हितों के टकराव” वाली समिति के गठन पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।

क्यों है विवाद? आरोपों में घिरा स्कूल ही बना ‘न्याय का रक्षक’

दीपक सिंह सरीन ने बताया कि उनकी संस्था 2021 से लगातार DFRC के गठन की मांग कर रही थी, ताकि निजी स्कूलों की मनमानी फीस वसूली और अन्य शिकायतों पर अभिभावकों को एक आधिकारिक मंच मिल सके। उन्होंने कहा, “देर से ही सही, समिति बनी तो, लेकिन इसका तरीका और संरचना देखकर लगता है कि यह अभिभावकों को न्याय देने के लिए नहीं, बल्कि स्कूलों के हितों की रक्षा के लिए बनाई गई है।”

सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि समिति में डीपीएस (दिल्ली पब्लिक स्कूल) आगरा को सदस्य के रूप में शामिल किया गया है। पापा संगठन के अनुसार, इसी स्कूल के खिलाफ कई अभिभावकों ने गंभीर शिकायतें दर्ज करा रखी हैं, जिन पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। प्रमुख आरोप हैं:

  • RTE का उल्लंघन: स्कूल पर शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) के तहत गरीब बच्चों को प्रवेश न देने और मानकों की अनदेखी करने का आरोप है।
  • अवैध शुल्क वसूली: कोविड काल के बाद स्कूल खुलने पर, शासनादेश के विरुद्ध जाते हुए, स्कूल ने अभिभावकों से डेढ़ महीने की अवैध परिवहन शुल्क (ट्रांसपोर्ट फीस) वसूली, जिसे आज तक वापस नहीं किया गया।
  • 15% फीस वापसी से इनकार: माननीय उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट आदेश के बावजूद, स्कूल ने कोविड काल की 15% फीस न तो वापस की और न ही समायोजित की।
  • किताब-कॉपी की दुकानदारी: नियमों को ताक पर रखकर, स्कूल सुल्तानगंज की पुलिया स्थित अपने ही कैंपस से कॉपी-किताबों की बिक्री करता है, जिससे अभिभावकों पर एक ही स्थान से महंगी सामग्री खरीदने का दबाव बनता है।

दीपक सरीन ने सवाल उठाया, “जिस स्कूल पर खुद नियमों के उल्लंघन के इतने गंभीर आरोप हों, उसे शुल्क नियामक समिति में सदस्य बनाकर ‘न्याय का रक्षक’ कैसे बनाया जा सकता है? यह तो चोर को ही तिजोरी की चाबी सौंपने जैसा है।”

चार्टर्ड अकाउंटेंट की भूमिका पर भी सवाल

समिति में एक चार्टर्ड अकाउंटेंट को भी बतौर सदस्य नियुक्त किया गया है। अभिभावक संगठन का आरोप है कि ये सीए कई निजी स्कूलों के साथ व्यावसायिक रूप से जुड़े हुए हैं और वर्षों से उनके वित्तीय सलाहकार रहे हैं। ऐसे में उनकी निष्पक्षता पर भरोसा कैसे किया जा सकता है? क्या जिला चयन समिति को पूरे आगरा में कोई ऐसा स्वतंत्र चार्टर्ड अकाउंटेंट नहीं मिला, जिसका निजी स्कूलों से कोई लेना-देना न हो?

PAPA की मांगें और भविष्य की रणनीति

इन गंभीर अनियमितताओं को देखते हुए, प्रोग्रेसिव एसोसिएशन ऑफ पेरेंट्स अवेयरनेस ने निम्नलिखित मांगें रखी हैं:

  1. बैठक रद्द हो: 23 जुलाई 2025 को कलेक्ट्रेट सभागार में प्रस्तावित समिति की पहली बैठक को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाए।
  2. समिति का पुनर्गठन हो: वर्तमान समिति को भंग कर, इसका निष्पक्ष रूप से पुनर्गठन किया जाए, जिसमें अनिवार्य रूप से मान्यता प्राप्त अभिभावक संगठनों के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाए।

संगठन ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि वे इस संबंध में उत्तर प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री और आगरा के जिलाधिकारी को एक औपचारिक शिकायत पत्र सौंप रहे हैं। यदि उनकी मांगों पर तत्काल कार्रवाई नहीं की गई और समिति का पुनर्गठन नहीं हुआ, तो वे अभिभावकों के साथ मिलकर जिलाधिकारी कार्यालय पर अनिश्चितकालीन धरने पर बैठने के लिए मजबूर होंगे।

यह मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है, और सभी की निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं कि क्या वे अभिभावकों की जायज मांगों को सुनकर समिति का पुनर्गठन करते हैं या निजी स्कूल लॉबी के दबाव में इस विवादास्पद समिति को ही जारी रखते हैं।

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