शाम 07:00 बजे, 31 जुलाई 2025 | स्थान: आगरा
- S.N. मेडिकल कॉलेज में “नीडल स्टिक इंजरी एवं बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट” विषय पर महत्वपूर्ण कार्यशाला का आयोजन।
- प्राचार्य डॉ. प्रशांत गुप्ता के नेतृत्व में हुए कार्यक्रम का उद्देश्य नर्सिंग स्टाफ को संक्रमण के जोखिम से बचाना।
- विशेषज्ञों ने पोस्ट-एक्सपोज़र प्रोफाइलेक्सिस (PEP) और कचरे के वैज्ञानिक निष्पादन पर दी तकनीकी जानकारी।
- नर्सिंग स्टाफ को दिया गया प्रायोगिक प्रशिक्षण (Hands-on Training) ताकि वे आपात स्थिति के लिए तैयार रहें।
आगरा। स्वास्थ्य सेवा के दौरान नर्सिंग स्टाफ की सुरक्षा सर्वोपरि है। इसी सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए, गुरुवार को एस. एन. मेडिकल कॉलेज, आगरा में नर्सिंग स्टाफ के लिए “नीडल स्टिक इंजरी एवं बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट” विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का सफलतापूर्वक आयोजन किया गया। इस महत्वपूर्ण प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन कॉलेज के प्राचार्य डॉ. प्रशांत गुप्ता के कुशल नेतृत्व में किया गया, जिसमें प्रमुख अधीक्षक डॉ. ब्रजेश शर्मा की भी गरिमामयी उपस्थिति रही।
इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य नर्सिंग स्टाफ को अस्पतालों में काम करते समय होने वाली ‘नीडल स्टिक इंजरी’ (सुई लगने से होने वाली चोट) के खतरों, उससे बचाव के तरीकों, आपातकालीन प्रतिक्रिया और बायोमेडिकल कचरे के सुरक्षित वैज्ञानिक निपटान के प्रति जागरूक करना था।
सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव: डॉ. संतोष कुमार
कार्यशाला का उद्घाटन करते हुए चेस्ट एवं टी.बी. विभाग के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, डॉ. संतोष कुमार ने अपने संबोधन में नर्सिंग स्टाफ की भूमिका की सराहना की। उन्होंने कहा, “आप सभी स्वास्थ्य सेवा की रीढ़ हैं, लेकिन आपकी अपनी सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। नीडल स्टिक इंजरी केवल एक सामान्य चोट नहीं है, यह एचआईवी, हेपेटाइटिस बी और सी जैसे गंभीर संक्रमणों का प्रवेश द्वार हो सकती है। आपकी एक छोटी सी लापरवाही न केवल आपके लिए, बल्कि आपके परिवार और समाज के लिए भी जोखिमपूर्ण हो सकती है। इसलिए, जागरूकता और सतर्कता ही इससे बचाव का सबसे बड़ा उपाय है।”
तकनीकी सत्रों में मिली गहन जानकारी
कार्यशाला के तकनीकी सत्र का संचालन सहायक आचार्य, डॉ. पारुल गर्ग ने किया। उन्होंने नर्सों को नीडल स्टिक इंजरी के प्रकार, इसके कारणों और जोखिमों के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने सबसे महत्वपूर्ण विषय, पोस्ट-एक्सपोज़र प्रोफाइलेक्सिस (PEP) पर गहन जानकारी दी। उन्होंने समझाया कि यदि दुर्भाग्यवश चोट लग भी जाती है, तो तत्काल क्या कदम उठाने चाहिए और कैसे PEP ट्रीटमेंट संक्रमण के खतरे को काफी हद तक कम कर सकता है।
इसके बाद, माइक्रोबायोलॉजी विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर, डॉ. प्रज्ञा शाक्य ने बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट के तकनीकी पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि अस्पतालों से निकलने वाले कचरे को हल्के में नहीं लिया जा सकता। उन्होंने विभिन्न रंग के कूड़ेदानों (लाल, पीला, नीला, काला) के महत्व को समझाते हुए बताया कि किस प्रकार का कचरा (सुई, सिरिंज, खून से सनी पट्टियां, प्लास्टिक) किस कूड़ेदान में जाना चाहिए ताकि उसका सुरक्षित और वैज्ञानिक तरीके से निपटान हो सके।
सिद्धांत के साथ प्रायोगिक प्रशिक्षण पर जोर
इस कार्यशाला की सबसे खास बात यह रही कि इसमें केवल सैद्धांतिक ज्ञान ही नहीं दिया गया, बल्कि प्रायोगिक प्रशिक्षण पर भी जोर दिया गया। अस्पताल प्रशासन से जुड़ीं डॉ. स्वाति चौधरी ने नर्सिंग स्टाफ को हैंड्स-ऑन ट्रेनिंग दी। इस सत्र में उन्होंने सही तरीके से सुई को डिस्पोज करने, बिना हाथ लगाए नीडल कैप को वापस लगाने (scoop method) और आपात स्थिति में उठाए जाने वाले कदमों का जीवंत प्रदर्शन किया।
इस पूरे कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करने और उसे सफलतापूर्वक क्रियान्वित करने का श्रेय माइक्रोबायोलॉजी विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर, डॉ. आरती अग्रवाल अग्रवाल को जाता है। उनके कुशल संयोजन के कारण ही यह कार्यशाला अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल रही। इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम स्वास्थ्य कर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और एक सुरक्षित अस्पताल वातावरण बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं।
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