आगरा। आगरा में यमुना की बाढ़ का कहर थमने के 10 दिन बाद आखिरकार सरकार को पीड़ितों की सुध आई है। हजारों लोगों के घर, खेत और फसलें बर्बाद होने के बाद अब प्रभारी मंत्री जयवीर सिंह ने नुकसान का सर्वे कराने का आदेश दिया है। इस घोषणा से पीड़ितों में उम्मीद की जगह निराशा ज्यादा है, क्योंकि उन्हें तत्काल मदद के बजाय सिर्फ लंबे सर्वे का वादा मिला है।
मंत्री जयवीर सिंह ने कहा है कि बाढ़ से हुए नुकसान का आकलन 15 दिन के अंदर किया जाएगा और इसके लिए दोहरी प्रक्रिया अपनाई जाएगी – पहले लेखपाल सर्वे करेंगे और फिर ड्रोन से भी जायजा लिया जाएगा। सवाल यह उठता है कि जब लोगों का सब कुछ तबाह हो चुका है, तो इस दोहरी और लंबी प्रक्रिया का क्या औचित्य है? क्या यह सिर्फ पीड़ितों को टालने का एक तरीका है?
बाढ़ पीड़ितों से मिलने के लिए मंत्री जयवीर सिंह खुद ट्रैक्टर पर बैठकर गाँवों तक पहुँचे, लेकिन ग्रामीणों को राहत सामग्री के नाम पर सिर्फ किट दी गईं, जबकि उनकी सबसे बड़ी जरूरत तत्काल आर्थिक मदद की है। मंत्री ने मौके पर ही राजस्व अधिकारियों और लेखपालों को बुलाया और उन्हें जल्द से जल्द रिपोर्ट देने को कहा। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अगर कोई शिकायत मिली तो कार्रवाई होगी।
आगरा में 1978 के बाद आई इस भीषण बाढ़ ने यमुना किनारे के कई गाँवों और कॉलोनियों को जलमग्न कर दिया था। कैलाश मंदिर से बटेश्वर तक का इलाका पूरी तरह डूब गया था। इस दौरान 19 वर्षीय रवेंद्र की यमुना में डूबकर मौत भी हो गई थी। उनके परिजनों को 4 लाख रुपये का चेक देकर संवेदना व्यक्त की गई, लेकिन बाकी हजारों पीड़ित आज भी मदद के इंतजार में हैं।
पीड़ितों का कहना है कि प्रशासन ने बाढ़ की चेतावनी के बावजूद समय पर कोई ठोस कदम नहीं उठाए। अब जब बाढ़ चली गई है, तो मुआवजे के लिए लंबा इंतजार कराया जा रहा है, जिससे उनकी मुश्किलें और बढ़ गई हैं।




































































































