
वॉशिंगटन डीसी / नई दिल्ली। याद है वो ‘नमस्ते ट्रंप’ का शोर, जब दोस्ती और व्यापारिक साझेदारी की बातें हो रही थीं? लेकिन अब वही दोस्ती व्यापारिक मोर्चे पर ‘धोखे’ जैसी लग रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार, 6 अगस्त 2025 को भारत पर फिर से 25% का अतिरिक्त टैरिफ (आयात शुल्क) लगाने का ऐलान कर दिया है। इसका सीधा मतलब ये है कि अब भारत से अमेरिका जाने वाले कई सामानों पर कुल 50% टैक्स लगेगा! यह आदेश आज, 6 अगस्त को जारी हुआ है और 21 दिन बाद यानी 27 अगस्त से लागू हो जाएगा। भारत ने इस अमेरिकी कार्रवाई को “गलत और अन्यायपूर्ण” करार दिया है और साफ कहा है कि अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जाएंगे।
क्या है ये टैरिफ और क्यों लगाया गया? आम आदमी की भाषा में समझें
टैरिफ (Tariff) क्या है? आसान भाषा में टैरिफ का मतलब है आयात शुल्क या कस्टम ड्यूटी। जब कोई देश दूसरे देश से कोई सामान खरीदता है (जिसे आयात करना कहते हैं), तो उसकी सरकार उस आने वाले सामान पर एक तरह का टैक्स लगा देती है। यह टैक्स लगाने से वो सामान खरीदने वाले देश के बाजार में महंगा हो जाता है। उदाहरण के लिए, अगर भारत से कोई कपड़े अमेरिका जा रहे हैं, और अमेरिका की सरकार उस पर 25% टैरिफ लगाती है, तो उन कपड़ों की कीमत अमेरिका में सीधे 25% बढ़ जाएगी। इससे अमेरिकी ग्राहक को वह कपड़ा महंगा मिलेगा।
इस बार क्यों लगा ये अतिरिक्त टैरिफ? ट्रंप प्रशासन का आरोप है कि भारत रूस से बहुत ज़्यादा तेल खरीद रहा है। अमेरिका का कहना है कि भारत ऐसा करके यूक्रेन के खिलाफ युद्ध लड़ रहे रूस की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहा है। चूंकि अमेरिका ने खुद मार्च 2022 से रूसी तेल के आयात पर पूरी तरह रोक लगा रखी है, इसलिए वह भारत के इस कदम से नाखुश है। ट्रंप ने मंगलवार को ही कड़ा रुख दिखाते हुए कहा था कि भारत पहले से ही अमेरिकी सामानों पर बहुत ज्यादा टैरिफ लगाता है, और वह अमेरिका के लिए एक ‘अच्छा बिजनेस पार्टनर’ नहीं है। उनका मानना है कि भारत रूस को आर्थिक मदद देकर ‘युद्ध मशीन को ईंधन’ दे रहा है।
कितना असर पड़ेगा? यह नया 25% अतिरिक्त टैरिफ, ट्रंप द्वारा 30 जुलाई को लगाए गए 25% टैरिफ के ऊपर लगाया गया है। इसका मतलब है कि भारत से अमेरिका जाने वाले कई सामानों पर अब कुल 50% टैरिफ लगेगा। इसका सीधा असर ये होगा कि भारत से निर्यात होने वाले सामान अमेरिका में बहुत ज़्यादा महंगे हो जाएंगे। जब सामान महंगा होगा, तो अमेरिकी ग्राहक उसे कम खरीदेंगे, जिससे भारत से होने वाले निर्यात (दूसरे देशों को सामान बेचना) में भारी कमी आएगी।
भारत की प्रतिक्रिया: ‘हमारा फैसला बाजार के हिसाब से, अन्याय नहीं सहेंगे’
अमेरिकी कार्रवाई पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने तुरंत और कड़ा रुख अपनाया है। मंत्रालय ने इस फैसले को “पूरी तरह से गलत, अन्यायपूर्ण और गैर-जरूरी” बताया है। भारत का कहना है कि वह रूस से तेल खरीदने या न खरीदने का फैसला अपनी ऊर्जा जरूरतों, बाजार की उपलब्धता और आर्थिक सिद्धांतों के हिसाब से करता है, न कि किसी बाहरी दबाव में। मंत्रालय ने साफ कहा है कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाएगा, जो इस अमेरिकी टैरिफ के प्रभावों को कम करने के लिए होंगे।
दवाओं पर 250% टैरिफ की पुरानी धमकी: क्या होगा हमारे ‘जेनरिक फार्मेसी’ का?
इससे भी ज़्यादा चिंताजनक बात ये है कि ट्रंप ने मंगलवार को ही एक टीवी इंटरव्यू में भारतीय फार्मास्युटिकल प्रोडक्ट्स (दवाइयों) पर 250% टैरिफ लगाने की धमकी दी थी! यानी, अगर भारत से कोई दवा अमेरिका जाएगी, तो उसकी कीमत ढाई गुना बढ़ जाएगी। ट्रंप चाहते हैं कि अमेरिका अपनी दवाइयां खुद बनाए और विदेशों पर निर्भरता कम करे।
भारत दुनिया में सस्ती और गुणवत्तापूर्ण दवाइयों का बड़ा सप्लायर माना जाता है। अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) के मुताबिक, अमेरिका में इस्तेमाल होने वाली लगभग 40% जेनेरिक दवाएं भारत से ही आती हैं। 2025 में अमेरिका को भारत का फार्मास्युटिकल निर्यात 7.5 अरब डॉलर (करीब 65 हजार करोड़ रुपए) से ज्यादा रहा। अगर यह 250% टैरिफ लगता है, तो भारत के फार्मा सेक्टर को बहुत बड़ा और विनाशकारी झटका लगेगा, क्योंकि हमारी सस्ती दवाएं अमेरिका में अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता पूरी तरह खो देंगी।
भारत और रूसी तेल: क्यों बने हम दूसरे सबसे बड़े खरीदार?
यूक्रेन युद्ध से पहले (फरवरी 2022 से पहले) भारत रूस से बहुत कम तेल खरीदता था (सिर्फ 0.2% यानी लगभग 68 हजार बैरल प्रतिदिन)। लेकिन युद्ध के बाद, जब रूस को पश्चिमी देशों से प्रतिबंधों के कारण तेल बेचने में दिक्कत आई, तो उसने भारत को भारी छूट पर तेल देना शुरू कर दिया। भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने और सस्ते तेल का लाभ उठाने के लिए इस मौके को भुनाया। इसी कारण आज हम चीन के बाद रूसी तेल के दूसरे सबसे बड़े खरीदार बन गए हैं। मई 2023 तक यह खरीद बढ़कर 45% (20 लाख बैरल प्रतिदिन) हो गई थी, जबकि 2025 में जनवरी से जुलाई तक भारत हर दिन रूस से औसतन 17.8 लाख बैरल तेल खरीद रहा है। पिछले दो सालों से भारत हर साल 130 अरब डॉलर (लगभग 11.33 लाख करोड़ रुपए) से ज़्यादा का रूसी तेल खरीद रहा है।
आम जन और व्यापार पर क्या असर पड़ेगा? विस्तार से समझें
ये टैरिफ सिर्फ कागजी आंकड़े नहीं हैं, इनका सीधा असर भारत के व्यापार और अप्रत्यक्ष रूप से आम लोगों पर भी पड़ सकता है:
- निर्यात पर भारी चोट: भारत से अमेरिका जाने वाले कई सामानों, जैसे कपड़े, इंजीनियरिंग प्रोडक्ट्स और कुछ अन्य वस्तुओं पर अब 50% टैक्स लगेगा। इसका मतलब है कि अमेरिकी बाजार में ये सामान बहुत ज़्यादा महंगे हो जाएंगे। जब सामान महंगा होगा, तो अमेरिकी ग्राहक उसे कम खरीदेंगे। इससे भारतीय कंपनियों का निर्यात कम होगा, जिससे उनका मुनाफा घटेगा और उत्पादन भी कम हो सकता है।
- नौकरियों पर असर: निर्यात घटने से जिन भारतीय फैक्ट्रियों और उद्योगों में ये सामान बनते हैं, वहां उत्पादन कम होगा। उत्पादन कम होने पर कंपनियों को कर्मचारियों की छंटनी करनी पड़ सकती है, जिससे रोजगार पर बुरा असर पड़ सकता है।
- ट्रेड सरप्लस में कमी: भारत का अमेरिका के साथ व्यापार अधिशेष (Trade Surplus) है, यानी हम अमेरिका को ज़्यादा सामान बेचते हैं और कम खरीदते हैं। टैरिफ बढ़ने से हमारा निर्यात घटेगा, जिससे यह अधिशेष कम हो सकता है, जो भारत की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत नहीं है।
- दवाइयों की लागत: फार्मास्युटिकल्स पर 250% टैरिफ की धमकी सबसे बड़ी चिंता है। अगर यह लागू होता है, तो भारतीय दवाएं अमेरिका में इतनी महंगी हो जाएंगी कि वे वहां बिकना लगभग बंद हो जाएंगी। इससे भारत के विशाल फार्मा उद्योग को बड़ा नुकसान होगा, और अमेरिकी मरीजों को भी महंगी दवाएं खरीदनी पड़ेंगी।
- जेम्स और ज्वेलरी: भारत से अमेरिका को सालाना 9 अरब डॉलर (करीब 79 हजार करोड़ रुपए) से ज़्यादा की ज्वेलरी (हीरे, रत्न, सोने-चांदी के गहने) निर्यात होती है। नए टैरिफ से इनके दाम बढ़ेंगे, जिससे भारतीय ज्वेलरी की मांग कम हो सकती है और इस सेक्टर में काम करने वाले लाखों लोगों की आजीविका प्रभावित हो सकती है।
- इलेक्ट्रॉनिक्स (फिलहाल सुरक्षित, पर खतरा): भारत से अमेरिका को करीब 14 अरब डॉलर के इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोडक्ट्स (लैपटॉप, सर्वर) निर्यात होते हैं। हालांकि, अभी ये ड्यूटी-फ्री हैं, लेकिन कार्यकारी आदेश में राष्ट्रपति को भविष्य में बदलाव करने का अधिकार है। अगर इन पर भी टैरिफ लगता है, तो भारत की लागत-प्रतिस्पर्धा कम हो सकती है।
- टेक्सटाइल और कपड़े: भारत से अमेरिका को हस्तनिर्मित सिल्क से लेकर औद्योगिक कॉटन कपड़ों तक का निर्यात होता है, जिसका मूल्य 2.5 अरब डॉलर से ज़्यादा है। 25% टैरिफ से इनकी कीमतें बढ़ेंगी, जिससे भारतीय टेक्सटाइल की मांग पर असर पड़ेगा और यह सेक्टर कमजोर हो सकता है।
यह स्थिति भारत के लिए एक बड़ी आर्थिक और कूटनीतिक चुनौती है। देखना होगा कि भारत सरकार इस ‘टैरिफ-झटके’ से निपटने और अपने व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए क्या रणनीतिक कदम उठाती है।