पिता को दफनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक आना पड़ा: सुप्रीम कोर्ट ने क्यों जताया दुख


तारीख: 23 जनवरी, 2025

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के 9 जनवरी 2025 के आदेश को चुनौती देने वाली विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। याचिकाकर्ता ने अपने ईसाई पिता को गांव के कब्रिस्तान में दफनाने की अनुमति मांगी थी, जिसे हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर सुनवाई करते हुए कहा कि मृतकों को सम्मानपूर्वक दफनाने का अधिकार सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता एक ईसाई आदिवासी हैं, जिनके पिता का 7 जनवरी 2025 को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया था। परिवार ने अपने पिता के अंतिम संस्कार के लिए गांव में दफनाने की योजना बनाई थी लेकिन गांव के कुछ लोगों ने इसका हिंसक विरोध किया। इसके कारण शव 7 जनवरी से अब तक शवगृह (मर्चरी) में रखा हुआ है।

हाई कोर्ट का फैसला

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने इस मामले में राहत देने से इनकार कर दिया था, जिसमें याचिकाकर्ता ने अपने पादरी पिता को छिंदवाड़ा के एक गांव के कब्रिस्तान में दफनाने की अनुमति मांगी थी। हाई कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि गांव में ईसाइयों के लिए कोई अलग कब्रिस्तान नहीं है और 20-25 किलोमीटर दूर करकपाल में कब्रिस्तान उपलब्ध है।

सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि मृतकों को सम्मानपूर्वक दफनाने के अधिकार को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए और उसने इस मुद्दे को सौहार्दपूर्ण तरीके से सुलझाने पर जोर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि जिस व्यक्ति ने अपना पूरा जीवन गांव में बिताया, उसे वहां दफनाने की अनुमति क्यों नहीं दी जा सकती? कोर्ट ने राज्य और हाई कोर्ट की विफलता पर नाराजगी जताई और कहा, “हमें दुख है कि एक व्यक्ति को अपने पिता को दफनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट आना पड़ा। न तो पंचायत, न ही राज्य सरकार, और न ही हाई कोर्ट इस समस्या का समाधान कर सका।”

सरकार की दलील पर आपत्ति

जस्टिस नागरत्ना ने राज्य सरकार की इस दलील पर भी आपत्ति जताई कि गांव के कब्रिस्तान में धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्तियों को दफनाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। कोर्ट ने सुझाव दिया कि याचिकाकर्ता अपने पिता को अपनी निजी जमीन पर दफना सकते हैं, लेकिन इस पर राज्य ने आपत्ति जताई कि यह भूमि की ‘पवित्रता’ को प्रभावित करेगा। कोर्ट ने सुनवाई के बाद अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया और कहा कि अंतिम निर्णय जल्द ही सुनाया जाएगा।

सरकार का पक्ष

राज्य की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जस्टिस बीवी नागरत्ना और सतीश चंद्र शर्मा की पीठ के सामने कहा कि दफनाने के लिए ईसाई जनजातियों के लिए निर्धारित क्षेत्र (जो गांव से 20-25 किलोमीटर दूर है) का उपयोग किया जाना चाहिए।

संवेदनशील मुद्दे का निपटारा

यह मामला मृतकों के सम्मानजनक अंतिम संस्कार के अधिकार, धार्मिक भेदभाव, और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े संवैधानिक और सामाजिक मुद्दों को उठाता है। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी भी की थी कि वह यह देखकर दुखी है कि एक व्यक्ति अपने पिता को ईसाई रीति-रिवाजों के अनुसार छत्तीसगढ़ के एक गांव में दफनाने के लिए शीर्ष अदालत तक पहुंचने को मजबूर हुआ क्योंकि अधिकारियों ने इस मुद्दे को सुलझाने में असफलता दिखाई।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर फैसला सुरक्षित रख लिया है और जल्द ही अंतिम निर्णय सुनाने की बात कही है। यह मामला न केवल मृतकों के सम्मानजनक अंतिम संस्कार के अधिकार को सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण है, बल्कि धार्मिक भेदभाव और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े संवैधानिक मुद्दों को भी उठाता है। सुप्रीम कोर्ट का निर्णय इस मामले में नजीर बनेगा और भविष्य में ऐसे मामलों में दिशा-निर्देश प्रदान करेगा।

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