39 साल बाद बरी हुए ‘फर्जी दस्तावेजों वाले’ सेना भर्ती के आरोपी: सच या साज़िश?

आगरा: क्या आपने सुना है कि कोई मुकदमा इतना लंबा चले कि पीढ़ियां बदल जाएं? आगरा में 1985 का एक मामला ऐसा ही था, जिसमें सेना भर्ती के दौरान फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल के आरोप में पकड़े गए छह युवकों को 39 साल बाद अदालत ने सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। यह कहानी सिर्फ आरोपियों की नहीं, बल्कि उस सिस्टम की है जो इंसाफ के लिए दशकों तक संघर्ष करता रहा।

1985: सेना भर्ती का दिन और साज़िश का खुलासा

19 सितंबर 1985, आगरा। सेना भर्ती की परीक्षा चल रही थी, लेकिन तभी कर्नल दीपक बत्रा की नजर कुछ युवकों पर पड़ी। उनके दस्तावेज संदिग्ध लगे। कर्नल ने तुरंत कार्रवाई की और छह युवकों—ओम प्रकाश, चंद्र प्रकाश, गुलाम मुर्तजा, जसवंत सिंह, भगवान सिंह और महेश चंद्र—को पकड़ा। आरोप था फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल करने का।

सेना ने मामले को गंभीरता से लेते हुए इन युवकों को पुलिस के हवाले कर दिया। सदर थाने में केस दर्ज हुआ और इनके खिलाफ धोखाधड़ी व जाली दस्तावेज इस्तेमाल करने की धाराएं लगाई गईं।

जमानत के बाद शुरू हुई लंबी लड़ाई

गिरफ्तारी के कुछ महीनों बाद सभी आरोपी जमानत पर छूट गए। लेकिन उनकी मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। केस अदालत में चला, और यह लड़ाई 39 साल तक जारी रही।

सिस्टम की धीमी चाल: 39 साल का सफर

1985 में ही पुलिस ने चार्जशीट दाखिल कर दी थी, लेकिन मामला अदालत में लटका रहा।

पुलिस गवाहों को पेश करने में नाकाम रही।

कोर्ट ने कई बार पुलिस और जिला प्रशासन को पत्र भेजे, लेकिन कोई ठोस सबूत या गवाह नहीं मिला।

तीन आरोपी कोर्ट में पेश ही नहीं हुए, और उनके खिलाफ वारंट भी जारी हुए।

गुनहगार या मासूम?

जांच में खुलासा हुआ कि ये युवक एक गिरोह के शिकार थे, जो पैसे लेकर नकली दस्तावेज बनाता था। आरोपी इसके चंगुल में फंस गए और उनकी ज़िंदगी एक संघर्ष बन गई।

अदालत का फैसला: इंसाफ या देरी का मजाक?

लंबे इंतजार के बाद अदालत ने सबूतों के अभाव में दो आरोपियों को बरी कर दिया। बाकी आरोपियों का मामला अलग अदालत में लंबित है।

क्या सीखा जाए?

कानूनी सुधार की ज़रूरत: यह मामला भारतीय न्याय प्रणाली की धीमी प्रक्रिया की हकीकत उजागर करता है।

जांच एजेंसियों की जवाबदेही: पुलिस और प्रशासन की लापरवाही ने इस केस को इतना लंबा खींचा।

39 साल की साज़िश का अंत

यह सिर्फ एक मुकदमा नहीं, बल्कि न्याय पाने के लिए संघर्ष की कहानी है। यह सिस्टम को आइना दिखाने का मौका है, ताकि भविष्य में किसी को इंसाफ के लिए इतने लंबे इंतजार का सामना न करना पड़े।

आखिरकार, 39 साल बाद इन युवकों की ज़िंदगी में एक नई सुबह आई, लेकिन सवाल ये है कि क्या इतनी देर से आया न्याय, न्याय कहलाएगा?

Pawan Singh

खबर भेजने के लिए व्हाट्स एप कीजिए +919412777777 pawansingh@todayexpress.in

Pawan Singh

खबर भेजने के लिए व्हाट्स एप कीजिए +919412777777 pawansingh@todayexpress.in

Related Posts

आगरा में नकली दवा सिंडिकेट पर बड़ी कार्रवाई: केंद्र की नजर, पूर्व डीजीपी की वर्कशॉप के बाद SIT गठित

आगरा। आगरा में नकली दवा कारोबारियों पर हुई कार्रवाई अब केवल एक स्थानीय मामला नहीं रह गया है। इस अवैध धंधे के सिंडिकेट को पूरी तरह से तोड़ने के लिए…

आगरा: एसीएम राजेश जायसवाल की मौत पर उठे सवाल, छात्र परिषद ने कहा- ‘फर्जीवाड़े की जांच कर रहे थे, शिक्षा माफिया के दबाव में थे’

आगरा। आगरा में अपर नगर मजिस्ट्रेट (एसीएम) तृतीय राजेश कुमार जायसवाल की शुक्रवार को एक सड़क हादसे में हुई मौत अब सवालों के घेरे में है। राष्ट्रीय छात्र परिषद ने…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *