आगरा यूनिवर्सिटी में कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल का ‘नाइट स्टे’: NAAC सहित कई मुद्दों पर अधिकारियों संग की समीक्षा, आज मिलेंगी प्रिंसिपलों से

आगरा। उत्तर प्रदेश की कुलाधिपति (राज्यपाल) आनंदीबेन पटेल ने बुधवार रात डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा के खंदारी स्थित गेस्ट हाउस में ‘नाइट स्टे’ किया। इस दौरान उन्होंने विश्वविद्यालय के अधिकारियों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक की, जिसमें शैक्षणिक और प्रशासनिक गतिविधियों की गहन समीक्षा की गई। गेस्ट हाउस में हुई अहम बैठक, इन मुद्दों पर हुई चर्चा बुधवार को आगरा में दो कार्यक्रमों में शामिल होने के बाद, कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस पहुंचीं, जहाँ उच्च शिक्षा मंत्री भी उनके स्वागत के लिए मौजूद थे। यहीं पर अधिकारियों के साथ बैठक हुई, जिसमें कई अहम मुद्दों पर कुलाधिपति को विस्तृत जानकारी दी गई। बैठक में मुख्य रूप से इन विषयों पर चर्चा हुई: आज योग वाटिका का उद्घाटन और प्रिंसिपलों से भेंट गुरुवार (आज) सुबह कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल खंदारी परिसर में नव निर्मित योग वाटिका का उद्घाटन करेंगी। इसके बाद वे सरकारी कॉलेज प्रतिनिधियों और AIDED कॉलेजों के प्राचार्यों (प्रिंसिपलों) के साथ एक बैठक करेंगी। इस बैठक के बाद, वे कृषि विज्ञान केंद्र, इटावा के लिए रवाना होंगी। कुलाधिपति का यह दौरा विश्वविद्यालय के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा और सुधार पर केंद्रित रहा है।

आगरा के KMI में गूंजी ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ की धुन: अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला में पं. बनारसी दास चतुर्वेदी को नमन, मॉरीशस से भी जुड़े वक्ता

आगरा। डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी हिंदी तथा भाषा विज्ञान विद्यापीठ (KMI) में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा: कल, आज और कल’ विषय पर आधारित एक द्विसाप्ताहिक अंतरविषयी अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। मंगलवार का सत्र विशेष रूप से महान साहित्यकार और स्वतंत्रता सेनानी पं. बनारसी दास चतुर्वेदी को समर्पित रहा, जहाँ उनके साहित्यिक और सामाजिक योगदान को याद किया गया। प्रवासी साहित्य के पुरोधा पं. बनारसी दास चतुर्वेदी को किया याद कार्यशाला की अध्यक्षता करते हुए आगरा कॉलेज की हिंदी विभाग की आचार्य प्रो. शेफाली चतुर्वेदी ने पं. बनारसी दास चतुर्वेदी के योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रवासी साहित्य की बात करते समय पं. बनारसी दास चतुर्वेदी को छोड़ा नहीं जा सकता। उन्होंने गिरमिटिया मजदूरों की दासता से मुक्ति के लिए लगातार प्रयत्न किए, और उनके जीवन पर्यंत संघर्ष ने भारतीय ज्ञान परंपरा और प्रवासी भारतीयों के बीच सेतु का काम किया। वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. निखिल चतुर्वेदी ने अपने नाना पं. बनारसी दास चतुर्वेदी को याद करते हुए बताया कि राज्यसभा के सदस्य रहते हुए उन्होंने केवल एक ही बात की चिंता की थी – वह किस तरह शहीदों को सम्मान दिला सकें और उनके परिवार के सदस्यों के पालन-पोषण की व्यवस्था कर सकें। विदेशों से भी जुड़े विद्वान, सनातन धर्म के प्रसार पर हुई चर्चा कार्यशाला में अंतरराष्ट्रीय वक्ताओं ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। मॉरीशस के महात्मा गांधी संस्थान, मोका से वरिष्ठ व्याख्याता डॉ. तनुजा पदारथ ने ऑनलाइन जुड़कर अपना वक्तव्य दिया। उन्होंने बताया कि फिजी, दक्षिण अफ्रीका, गयाना, सूरीनाम जैसे देशों में जहाँ भारतीय मूल के लोग पहुँचे, वे अपने साथ भारत से श्री रामचरितमानस, हनुमान चालीसा, गंगाजल आदि वस्तुएं लेकर गए। उनके आगमन से ही इन देशों में सनातन धर्म और काली माई की परंपरा देखी जाती है। यह भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा के वैश्विक प्रसार को दर्शाता है। विद्वानों ने सराहा चतुर्वेदी का योगदान, भारतीय ज्ञान पर हुई गहन चर्चा बैकुंठी देवी कन्या महाविद्यालय के हिंदी विभाग से प्रो. गुंजन ने कहा कि एक व्यक्ति जब महापुरुष हो जाता है, तो वह किसी व्यक्ति विशेष का नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज का हो जाता है। यह बात पं. बनारसी दास चतुर्वेदी के योगदान पर भी लागू होती है। दयालबाग विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग से डॉ. निशीथ गौड़ ने कहा कि पंडित बनारसी दास चतुर्वेदी का योगदान भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक संदर्भ में पुनः परिभाषित करने जा रहा है। साहित्यकार देवेश बाजपेई ने भी पंडित बनारसी दास चतुर्वेदी और गिरमिटिया प्रवासी भारतीयों पर अपने विचार रखे। सांध्यकालीन सत्र का अध्यक्षीय उद्बोधन प्रो. सुगम आनंद ने दिया। विशिष्ट अतिथि के रूप में आरबीएस कॉलेज के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. युवराज सिंह उपस्थित थे। आकाशवाणी से अनेन्द्र सिंह और केंद्रीय हिंदी संस्थान से डॉ. राजश्री ने भारतीय ज्ञान परंपरा पर अपना वक्तव्य प्रस्तुत किया। केएमआई के संस्कृत विभाग की व्याख्याता डॉ. वर्षा रानी ने भी अपना वक्तव्य प्रस्तुत किया। कार्यशाला का संचालन डॉ. रमा और डॉ. शीरीन ज़ैदी ने कुशलतापूर्वक किया। यह कार्यशाला भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न पहलुओं को उजागर करने और उसे आधुनिक संदर्भ में समझने का एक महत्वपूर्ण मंच साबित हो रही है।

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